~ Dreams and Illusions!

फिर क्या हुआ?
होना क्या है,
वही कहानी फिर एक बार,
मज़नू ने लिऐ कपड़े फाड़,
मार तमाशा बीच बाज़ार.
रूक के सोचा, ऐसा क्यों?
ऐसा-वैसा-जैसा-तैसा-पैसा!
पैसा!
पैसा न होता तो फिर कैसा होता!
सोचो?
अरे छोड़ो बोरिंग बातें सारी,
मस्त रहो, जम़ के खाओ,
ले लो पंगे, चढ़लो सूली!
फाड़ लो कपड़े, तोड़ दो बंधन, खोल दो रस्सी, बोल दो किस्सा!
सब ही जनों का दिल बहलाओ,
शोर मचाओ!!
जो रोज़ किया है, फिर से वही करूंगा,
फिर से करूंगा, फिर से करूंगा!
अच्छा बेटा,
कभी इधर तो कभी उधर,
अंदर क्या है?
अंदर क्या है?
कौनसे रंग का दिल है तेरा, क्या चाहता है?
*तारा* *तारा*
कौनसा तारा?
किस मंज़िल का? क्या चक्कर है?
कहां चला है दिल का रिश्ता बिन कदमों के!
“दूर खड़ी सपनों की मल्लिका,
है थोड़ी ना यार, मिराज़ है!”
जो डेज़र्ट में दिखता है!
होती रेत है, लगता पानी!
उसके लिऐ मैं पापड़ बेलूँ?
दो कौड़ी की हस्ती है, पर उस्से खेलूँ?
फेक बिखेरूँ अपना सब कुछ उसकी खातिर?
किसे चाहिऐ मन का सोना, आँख की मोती,
किसे पड़ी है, अंदर क्या है?
होती रेत है,
लगता पानी!!

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